आज जब कसाब की फांसी की खबर सुनी तो एक बार फिर ये सोचने पे मजबूर हो गया की कौन सी सजा भयानक है ? सजा होने के कुछ दिनों के अन्दर ही फांसी के फंदे पर लटक कर एक झटके में आज़ाद हो जाना या फिर सजा होने के बाद सालों तक रोज़ तिल-तिल कर मरना जबकि आपकी ज़िन्दगी किसी एक इंसान के दस्तखत की मुहताज हो। जहां एक तरफ तो 26/11 के अकेले जिंदा गिरफ्तार अपराधी कसाब को अपने अंजाम तक पहुँचने में 4 साल लगे वहीँ संसद पर हमले की साज़िश रचने के आरोप में 2004 में उच्चतम न्यायलय से मौत की सजा पाए अफज़ल गुरु की दया याचिका पर अभी तक फैसला नहीं हो सका है।
हालांकि कसाब की सजा में कथित देरी को लेकर भी कम राजनीति और शोर शराबा नहीं किया गया,फिर चाहे वो कुछ राजनीतिक दल हो जोकि अपनी दलगत राजनीति से मजबूर हैं या फिर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कुछ अति सक्रिय कथित राष्ट्रवादी जिनका ज्ञान,बुद्धि और देशप्रेम कॉपी,पेस्ट,लाइक और शेयर जैसी फेस्बुकिया गतिविधियों तक ही सीमित है। पर इस शोर-शराबे में वो इस बात को तो बिलकुल ही भूल जाते हैं या जानबूझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि इस देश का एक संविधान भी है और कसाब की सज़ा देने में न्यायिक प्रकिया का अनुसरण किया गया है। ऐसे लोग अक्सर अमेरिका द्वारा 9/11 के बाद लादेन को अंजाम तक पहुंचाने की प्रक्रिया का उदाहरण देते हैं पर वो भी इस बात को भूल जाते हैं कि 9/11 का मुख्य साजिशकर्ता खालिद शेख मोहम्मद,जिसे 2003 में पाकिस्तान में गिरफ्तार करके 2007 में अमेरिका को सौंप दिया गया था, का अभी तक ट्रायल ही चल रहा है और सजा होने में अभी भी वक़्त लग सकता है। और फिर खालिस अमेरिकी तरीके से भी ओसामा को अंजाम तक पहुंचाने में 10 साल तो लग ही गए। तो इस हिसाब से तो भारत ने फिर भी तेज़ी दिखाई है।
अब फिर से आते हैं अफज़ल गुरु पर जिसे की 2004 में सजा तो सुना दी गयी पर फाँसी आज तक नहीं हुई है। उसकी दया याचिका को इतने सालों तक लंबित रखना अपने आप में ही काफी विवादित मसला है जिसके पीछे जो भी कारण हैं ये लगभग सभी को पता हैं और इस मुद्दे पर पहले भी काफी कुछ कहा सुना जा चुका है पर यहाँ मेरा मकसद राजनीति करना नहीं है।यहाँ तो मैं ये कहना चाहता हूँ की अफज़ल को शायाद इसी तरह लगता होगा जैसे वो एक रेल की पटरी पे बँधा हो और मौत उसकी तरफ़ पैसेंजर ट्रेन की रफ़्तार से आ रही हो जबकि कसाब को बग़ल वाली पटरी पर काफ़ी बाद में लाकर बाँधा गया और शताब्दी उसके ऊपर से गुज़र भी गयी।या फिर एक तो कैंसर जैसी बीमारी से रोज़ ज़रा-ज़रा मरे और दूसरा बंदा हर्ट-अटैक से एक झटके में ही ख़त्म हो जाए।
निश्चित तौर पर पहली सज़ा ज्यादा भयानक होगी और शायद यही अफज़ल जैसे आतंकियों के लिए सही सज़ा भी है।
अफज़ल गुरु को जल्दी फँसी देने की मांग करने वालों को इस पहलू पर भी गौर फरमाना चाहिए।


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