कुछ अनसुलझे सवाल और
एक परेशान सा दिल
लिए घूमता हूँ बेवजह
मैं मंजिल मंजिल
ज़िन्दगी जैसे एक खँडहर सा
हो माजी का
और ये सवाल चकराते हैं उसमे आसेबों जैसे
अपने ख़्वाबों कि लाश उठाये घूमता हूँ
जैसे विक्रम उठाये हो बेताल को अपने कन्धों पर .........
Thursday, November 15, 2012
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