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Friday, October 25, 2013

ज़िन्दगी !!
पहले भी ऐसी ही थी
फर्क बस इतना है कि
पहले यादें कम और बातें ज्यादा थीं
और अब
बातें कम और यादें ज्यादा हैं
अब भी पहले की तरह ही
रोज़ सुबह शाम होती है
पर उस एक शाम के बाद
कोई शाम
कोई सुबह
पहले जैसी भी तो नहीं रही
सूरज की रौशनी भी वही है
ना ही चाँद की रौशनी कुछ नई है
बस हर लडखडाते क़दम पे
संभालने के लिए तुम्हारा सहारा नहीं है
अपनी खुशियों में खुश हर चेहरे पर
तुम्हारी हंसी ढूँढता रहता हूँ
हर एक की नाराज़गी में
उस एक डांट का इंतज़ार रहता है
लम्हे यूँ ही गुज़रते जाते हैं
पर हर लम्हे के साथ
तुम मेरे अन्दर और भी ज्यादा  जिंदा हो जाते हो
अक्सर अँधेरी रातों में पुकार लेते हो
और फिर रातें और भी लम्बी हो जाती हैं
अँधेरा और भी बढ़ जाता है
और फिर इंतज़ार
इंतज़ार सुबह का
जोकि कभी आती ही नहीं

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